18 साल, 56 बाघ: सरिस्का से देश की नई बाघ योजना तक

सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन के 18 साल पूरे होने पर राष्ट्रीय कार्यशाला हुई। 56 बाघों वाला यह मॉडल अब 22 कम बाघ वाले अभयारण्यों की नई योजना का आधार बन रहा है।

सरिस्का में 18 साल बाद 56 बाघ, नई राष्ट्रीय योजना
अंतिम अपडेटJun 28, 2026, 11:14:57 PM
5 दिन पहले
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18 साल, 56 बाघ: सरिस्का से देश की नई बाघ योजना तक

56 बाघ—सरिस्का की यह संख्या सिर्फ वन्यजीव गणना नहीं, भारत के संरक्षण मॉडल की सबसे तेज सुनाई देने वाली कहानी है। राजस्थान के अलवर में जहां कभी बाघ स्थानीय रूप से खत्म हो गए थे, वहीं 2008 में रणथंभौर से लाए गए तीन बाघों से शुरू हुई पुनर्स्थापन यात्रा अब राष्ट्रीय नीति की दिशा तय कर रही है। इसी उपलब्धि के 18 साल पूरे होने पर सरिस्का में राष्ट्रीय कार्यशाला हुई, जिसमें बाघों को फिर से बसाने की सफलताओं और चूकों दोनों पर खुलकर चर्चा हुई।

अलवर में बाघ संरक्षण बैठक के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव
सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन पर राष्ट्रीय मंथन — Amar Ujala

सीधी बात

  • सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन के 18 वर्ष पूरे होने पर अलवर में राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित हुई।
  • 2008 में तीन बाघों से शुरू हुई पहल के बाद सरिस्का में बाघों की संख्या 56 तक पहुंची है।
  • केंद्र ने बाघ विहीन या कम बाघ वाले 22 अभयारण्यों में बाघों की मौजूदगी बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया है।
  • देश में अब 58 टाइगर रिजर्व हैं और अनुमानित 3,682 बाघ निवास करते हैं।
  • सरिस्का और पन्ना को सफल मॉडल माना गया, जबकि सतकोसिया और राजाजी जैसे अनुभवों से सीख लेने की बात सामने आई।

घटनाक्रम समझिए

अलवर के सरिस्का टाइगर रिजर्व में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राजस्थान सरकार के सहयोग से बाघ पुनर्वास पर कार्यशाला आयोजित की गई। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसका उद्घाटन किया और बाघ संरक्षण तथा प्रोजेक्ट चीता से जुड़े तीन प्रकाशन जारी किए। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसमें देश के बाघ बहुल क्षेत्रों के क्षेत्रीय निदेशक, मुख्य वन्यजीव वार्डन और वन्यजीव विशेषज्ञ शामिल हुए।

सरिस्का को इस चर्चा का केंद्र इसलिए बनाया गया क्योंकि यहां का इतिहास संरक्षण की असफलता और वापसी, दोनों को साथ दिखाता है। 2005 में यहां बाघ स्थानीय रूप से विलुप्त हो गए थे। 28 जून 2008 को रणथंभौर से बाघ लाकर पुनर्स्थापन शुरू हुआ। आज यही जगह सफल वैज्ञानिक पुनर्वास के उदाहरण के रूप में रखी जा रही है।

बाघ संरक्षण और पुनर्बहाली योजना से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर
कम बाघ वाले अभयारण्यों में पुनर्बहाली की योजना पर चर्चा — Jagran

बैठक में सिर्फ सफलता का उत्सव नहीं था। रिपोर्टों और चर्चा में सतकोसिया और राजाजी जैसे मामलों का भी उल्लेख हुआ, जहां उम्मीद के अनुरूप नतीजे नहीं मिले। दिप्रिंट हिंदी के अनुसार, सतकोसिया में 2018 में दो बाघों को फिर से बसाया गया था, लेकिन वहां अभी बाघों की संख्या शून्य है। राजाजी के पश्चिमी हिस्से में 2020 में पांच बाघ लाए गए थे और संख्या अब भी उतनी ही है।

यही कारण है कि नई योजना में केवल बाघ छोड़ने की बात नहीं है। मंत्रालय और एनटीसीए पलामू और बक्सा सहित 22 बाघ विहीन या कम बाघ वाले अभयारण्यों में मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से करीब पांच से छह अभयारण्यों को दूसरे राज्यों से बाघ उपलब्ध कराने पर सहमति भी दी गई है।

यह क्यों मायने रखता है

बाघ संरक्षण का असर सिर्फ एक करिश्माई प्रजाति तक सीमित नहीं रहता। भूपेंद्र यादव ने कार्यशाला में कहा कि बाघों का संरक्षण वनों, जलक्षेत्रों और जैव विविधता की रक्षा से जुड़ा है। इसका सीधा अर्थ है कि जहां बाघों के लिए आवास सुरक्षित किया जाता है, वहां जल स्रोत, शिकार प्रजातियां, वनस्पति और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र भी बेहतर निगरानी में आते हैं।

सरिस्का की कहानी यह भी बताती है कि स्थानीय समुदायों को साथ लिए बिना संरक्षण अधूरा रह जाता है। आधिकारिक बयान में पन्ना और सरिस्का की सफलता को सामुदायिक सहयोग से जोड़ा गया, जबकि सतकोसिया में अपेक्षित सामुदायिक भरोसा न बन पाने को कमजोर नतीजों से जोड़ा गया। भारत जैसे देश में, जहां जंगलों के आसपास गांव, धार्मिक स्थल और पर्यटन गतिविधियां साथ-साथ मौजूद हैं, संरक्षण को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

सरिस्का कार्यशाला पर दैनिक भास्कर की रिपोर्ट से जुड़ा प्रकाशक चित्र
कार्यशाला में कई राज्यों के वन अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल हुए — Dainik Bhaskar

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए भी अहम है क्योंकि देश में दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघों का संरक्षण होने की बात स्रोतों में सामने आई है। जब भारत अपने टाइगर रिजर्व की संख्या 46 से 58 तक ले जाता है, तो यह संरक्षण, पर्यटन, स्थानीय रोजगार और मानव-वन्यजीव संघर्ष—इन सभी क्षेत्रों पर असर डालता है।

आगे क्या होगा

कार्यशाला के निष्कर्षों की समीक्षा एनटीसीए की समिति करेगी। अमर उजाला के अनुसार, भूपेंद्र यादव ने कहा कि इस दो दिवसीय तकनीकी कार्यक्रम के निष्कर्ष बाद में समीक्षा के लिए रखे जाएंगे, ताकि कमियों और संसाधन वाले क्षेत्रों की पहचान कर संतुलन बनाया जा सके।

राजस्थान के वन राज्यमंत्री संजय शर्मा ने भरोसा जताया कि सरिस्का में बाघों की संख्या इस वर्ष के अंत तक 60 तक पहुंच सकती है। वहीं, नई राष्ट्रीय योजना की दिशा उन अभयारण्यों पर टिकेगी जहां बाघ नहीं हैं या बहुत कम हैं—और इस बार सबक साफ है: वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ स्थानीय भरोसा भी उतना ही जरूरी होगा।

पाठकों के सवाल

सरिस्का में अभी कितने बाघ हैं?

स्रोतों के अनुसार, सरिस्का में बाघों की संख्या 56 तक पहुंच चुकी है। राजस्थान के वन राज्यमंत्री संजय शर्मा ने वर्ष के अंत तक इसके 60 तक पहुंचने की उम्मीद जताई है।

सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन कब शुरू हुआ था?

सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन 28 जून 2008 को शुरू हुआ था, जब रणथंभौर से बाघ लाए गए थे। यह पहल अब 18 साल पूरे कर चुकी है।

कितने अभयारण्यों में बाघों की पुनर्बहाली की योजना है?

केंद्र और एनटीसीए बाघ विहीन या कम बाघ वाले 22 अभयारण्यों में बाघों की मौजूदगी बढ़ाने की योजना पर काम कर रहे हैं।

सरिस्का मॉडल को खास क्यों माना जा रहा है?

क्योंकि यहां बाघ स्थानीय रूप से खत्म हो गए थे, फिर वैज्ञानिक प्रबंधन, निगरानी और सामुदायिक भागीदारी के जरिए आबादी शून्य से 56 तक पहुंची।

कौन से उदाहरण सफल नहीं रहे?

स्रोतों में ओडिशा के सतकोसिया और उत्तराखंड के राजाजी का उल्लेख है, जहां बाघ पुनर्स्थापन के नतीजे सरिस्का और पन्ना जैसे नहीं रहे।

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लेखक

Sandy Nageeb

वरिष्ठ संपादक

प्रौद्योगिकी, विज्ञान और स्वास्थ्य को कवर करने वाले अनुभवी लेखक और संपादक।

यह लेख AI-सहायता प्राप्त संपादकीय टूल की मदद से तैयार किया गया और प्रकाशन से पहले Trend Digest के संपादकीय मानकों के तहत समीक्षा की गई।

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