अंतिम अपडेट: 6 अप्रैल, 2026
बिहार में मौसम की मार और सूखती नदियां: कटिहार में तरबूज की खेती पर संकट
बिहार के कटिहार जिले में इस साल 500 एकड़ से अधिक भूमि पर तरबूज की खेती की गई है, लेकिन बेमौसम बदलाव ने किसानों की कमर तोड़ दी है। नदियों के किनारे रेतीली जमीन पर उगने वाले इन रसदार फलों पर अब अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। अप्रैल की शुरुआत में ही नदियों का जलस्तर जिस तरह से गिरा है, उसने कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय उत्पादकों को गहरी चिंता में डाल दिया है।

मुख्य बातें
- 500 एकड़ से अधिक की फसल पर मौसम के उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ा है।
- कटिहार की नदियों का जलस्तर समय से पहले गिरने के कारण सिंचाई की गंभीर समस्या पैदा हो गई है।
- तापमान में अचानक वृद्धि और गर्म हवाओं के कारण फल समय से पहले पक रहे हैं या खराब हो रहे हैं।
- किसानों के अनुसार, निवेश की गई पूंजी निकालना भी अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण फसल चक्र में बदलाव आ रहा है, जिससे पारंपरिक खेती पिछड़ रही है।
हालात की जमीनी हकीकत
बिहार के भागलपुर और कटिहार जैसे जिलों में दियारा क्षेत्र की रेतीली मिट्टी तरबूज और खरबूजे के लिए मशहूर रही है। लेकिन इस साल कहानी कुछ अलग है। अप्रैल के पहले हफ्ते में ही नदियां इस कदर हांफने लगी हैं कि वहां केवल रेत के टीले नजर आ रहे हैं। 'आसमान से बरसती आग' और पानी की कमी ने मिलकर किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

कटिहार के किसान बताते हैं कि उन्होंने अपनी जमा-पूंजी इस उम्मीद में लगाई थी कि गर्मियों में तरबूज की अच्छी मांग रहेगी। लेकिन मौसम की अनिश्चितता ने उत्पादन को प्रभावित किया है। जब पौधों को नमी की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तभी नदियों ने साथ छोड़ दिया। अब स्थिति यह है कि पंप सेट के जरिए सिंचाई करना आर्थिक रूप से महंगा पड़ रहा है।
नदियों का सूखना केवल पानी की कमी नहीं है, बल्कि यह हमारे रोजगार के खात्मे का संकेत है। रेत पर मेहनत करना अब जुआ खेलने जैसा हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि कभी भागलपुर के आसपास मोटे अनाज (मिलेट्स) की खेती प्रचुर मात्रा में होती थी, लेकिन बाढ़ और भौगोलिक बदलाव के कारण वह अब लुप्त प्राय है। अब यही खतरा तरबूज की खेती पर भी मंडराने लगा है। मौसम वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव मान रहे हैं, जहां नदियां अपना रास्ता और जलस्तर दोनों खो रही हैं।
यह स्थिति चिंताजनक क्यों है?
बिहार के आम नागरिकों के लिए यह केवल तरबूज की कमी का मामला नहीं है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। जब स्थानीय स्तर पर उत्पादन गिरता है, तो बाजार में कीमतें आसमान छूने लगती हैं। 'महंगाई की मार' पहले से ही झेल रहे लोगों के लिए गर्मियों का यह सस्ता फल भी अब पहुंच से दूर हो सकता है।

क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदियों का अस्तित्व इसी तरह खतरे में रहा, तो आने वाले कुछ वर्षों में फसल चक्र पूरी तरह बदल जाएगा। किसान अब ऐसी फसलों की ओर रुख करने को मजबूर हैं जिनमें पानी की खपत कम हो, लेकिन तरबूज जैसी नकदी फसलों का नुकसान उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर देगा।
आगे क्या होगा?
आने वाले हफ्तों में अगर तापमान में और वृद्धि होती है, तो बची-कुची फसल भी झुलस सकती है। नदियों के खूसे स्थलों पर सिंचाई के वैकल्पिक साधनों की व्यवस्था की मांग उठ रही है। किसान सरकार से मुआवजे और बेहतर सिंचाई बुनियादी ढांचे की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: कटिहार में तरबूज की खेती क्यों प्रभावित हो रही है?
उत्तर: मुख्य कारण बेमौसम गर्मी और नदियों के जलस्तर में समय से पहले आई भारी गिरावट है। इससे सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है और फल खराब हो रहे हैं।
प्रश्न: इस साल कटिहार में कितने क्षेत्र में तरबूज उगाया गया है?
उत्तर: आधिकारिक आंकड़ों और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 500 एकड़ रेतीली जमीन पर तरबूज की खेती की गई है।
प्रश्न: क्या इसका असर तरबूज की कीमतों पर पड़ेगा?
उत्तर: हां, उत्पादन कम होने और सिंचाई की लागत बढ़ने के कारण स्थानीय बाजारों में तरबूज के दाम बढ़ने की पूरी संभावना है।
प्रश्न: क्या जलवायु परिवर्तन का असर अन्य फसलों पर भी पड़ रहा है?
उत्तर: बिल्कुल, भागलपुर में मोटे अनाज की खेती पहले ही लगभग समाप्त हो चुकी है और अब दियारा क्षेत्र की अन्य नकदी फसलें भी संकट में हैं।
संसाधन
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