अमेरिका-ईरान शांति समझौते से इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू को लगा बड़ा झटका, बढ़ा राजनीतिक दबाव
स्विट्ज़रलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को लेकर एक महत्वपूर्ण शांति समझौता हुआ है, जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग' के तहत हुई इस दो दिवसीय वार्ता की सफलता ने इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। भारत समेत दुनियाभर के नीति विशेषज्ञ इस कूटनीतिक बदलाव पर करीबी नजर रखे हुए हैं, क्योंकि इस समझौते ने नेतन्याहू को क्षेत्र में अलग-थलग कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से नाखुश नेतन्याहू ने अब अमेरिका पर से अपनी सैन्य निर्भरता खत्म करने और स्वतंत्र हथियार प्रणाली विकसित करने का बड़ा ऐलान किया है।

पृष्ठभूमि
इसराइल लंबे समय से ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। इस साल 28 फ़रवरी को अमेरिका के सहयोग से इसराइल ने ईरान पर एक बड़ा हवाई हमला किया था, जिसे इतिहास का सबसे बड़ा संयुक्त अभियान बताया गया। इस कार्रवाई में ईरान के परमाणु ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाने और उसके 20 प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों को मार गिराने का दावा किया गया था। इन वैज्ञानिकों में से 12 'ऑपरेशन राइजिंग लायन' और 8 'ऑपरेशन रोअरिंग लायन' के दौरान मारे गए थे।
नेतन्याहू ने हमेशा खुद को अमेरिका का सबसे करीबी और वाशिंगटन पर वास्तविक प्रभाव रखने वाला नेता साबित करने की कोशिश की है। हालांकि, स्विट्ज़रलैंड में हुई कूटनीतिक बातचीत ने उनके इन दावों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के पहले ही पैराग्राफ में स्पष्ट है कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी लेबनान सहित 'हर मोर्चे' पर सैन्य अभियान तुरंत और स्थायी रूप से खत्म करेंगे। इस वार्ता में इसराइल को शामिल नहीं किया गया, जिसे नेतन्याहू के राजनीतिक करियर के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
यहाँ क्या हुआ
स्विट्ज़रलैंड में संपन्न हुई इस उच्चस्तरीय वार्ता में अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक सहमति बनी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पुष्टि की है कि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों को अपने देश में प्रवेश और परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी की अनुमति दे दी है। इसके बदले में अमेरिकी वित्त विभाग ने ईरानी तेल की आपूर्ति और बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने के लिए एक जनरल लाइसेंस जारी किया है, जो 21 अगस्त तक प्रभावी रहेगा।

इस समझौते के तहत अमेरिका भविष्य में ईरान की जमी हुई संपत्तियों को आंशिक रूप से खोलने पर विचार कर रहा है, जिसकी निगरानी कतर करेगा। इस धन का उपयोग ईरान द्वारा अमेरिकी सोयाबीन, मक्का और गेहूं जैसे कृषि उत्पादों को खरीदने के लिए किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, ईरान को करीब 300 अरब डॉलर तक के दीर्घकालिक विकास ढांचे पर चर्चा का मौका भी मिलेगा। कूटनीतिक स्तर पर इस बड़ी बढ़त ने ईरान को आर्थिक और राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, जिससे इसराइल की चिंताएं बढ़ गई हैं।
लोग क्या कह रहे हैं
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि इसराइल उनका सम्मान करता है और उनकी हर बात मानता है। इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इजराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ट्रंप के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। वेस्ट बैंक के गश एत्जियोन में सैन्य अफसरों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ट्रंप की हर बात पर हामी नहीं भरते।
नेतन्याहू ने अपनी संप्रभुता का पक्ष रखते हुए कहा:
हम आज़ाद और गौरवशाली देशों के नेता हैं। कभी-कभी हमारी राय एक-दूसरे से अलग होती है। हम अपने हितों के लिए खड़े होते हैं। मैं इसराइल के हितों और उसकी सुरक्षा के लिए खड़ा हूं। हमें हथियार उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की जरूरत है। हमें अपने हथियार खुद बनाने होंगे।
वहीं, इसराइल के कट्टर दक्षिणपंथी दल और नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बेन-ग्विर ने भी इस समझौते का विरोध करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि वे ट्रंप के इस समझौते से बंधे नहीं हैं, क्योंकि यह उनकी सुरक्षा पक्की नहीं करता। दूसरी तरफ, ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अज़ीज़ी ने भी अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट पर अंतिम फ़ैसला केवल ईरान की संप्रभु सेना ही करेगी।
व्यापक परिप्रेक्ष्य
इस शांति समझौते ने मध्य-पूर्व के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। एक तरफ जहां वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य (होर्मुज़ स्ट्रेट) को खुला रखने पर सहमति बनी है, वहीं दूसरी तरफ इसराइल के भीतर नेतन्याहू के लिए घरेलू राजनीतिक संकट गहरा गया है। कुछ ही महीनों में इसराइल में आम चुनाव होने वाले हैं, और नेतन्याहू पहले से ही रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने राष्ट्रपति आइज़ैक हरज़ोग से माफ़ी की दरख़्वास्त भी की थी।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उसका संवर्धित यूरेनियम का भंडार अभी भी उसी स्थिति में है, जिससे इसराइल का मुख्य उद्देश्य विफल होता दिख रहा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की हालिया टिप्पणी ने इस घाव पर नमक छिड़कने का काम किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि हाल के महीनों में इसराइल द्वारा इस्तेमाल किए गए दो-तिहाई हथियार अमेरिका ने फंड किए थे। यही कारण है कि नेतन्याहू अब विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर रणनीतिक निर्भरता कम करके घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने के लिए छटपटा रहे हैं।
आगे की राह
स्विट्ज़रलैंड में उच्चस्तरीय बैठकें समाप्त होने के बाद अब दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों की बातचीत अगले कई दिनों तक जारी रहेगी। इस अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका और ईरान को 60 दिनों के भीतर परमाणु कार्यक्रम समेत सभी विवादित मुद्दों पर एक स्थायी समाधान तलाशना है। अमेरिका की ओर से इस तकनीकी बातचीत का नेतृत्व जैरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, लेबनान के मोर्चे पर तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रहेंगे, क्योंकि ईरान ने साफ कर दिया है कि लेबनान में पूर्ण संघर्ष विराम ही किसी भी व्यापक समझौते की वास्तविक सफलता तय करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
अमेरिका और ईरान के बीच समझौता कहाँ और किसकी मध्यस्थता में हुआ?
यह महत्वपूर्ण समझौता स्विट्ज़रलैंड के बर्गेनस्टॉक में आयोजित हुआ। इस पूरी कूटनीतिक शांति वार्ता में पाकिस्तान और कतर ने मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।
बेंजामिन नेतन्याहू इस समझौते का विरोध क्यों कर रहे हैं?
नेतन्याहू का मानना है कि इस समझौते में इसराइल को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। इसके अलावा, ईरान को मिलने वाली आर्थिक छूट और उसका मजबूत होता परमाणु कार्यक्रम इसराइल की सुरक्षा के लिए बड़ा राजनीतिक और सैन्य झटका है।
ईरान को इस समझौते से क्या आर्थिक लाभ होने की उम्मीद है?
समझौते के तहत ईरान पर लगे तेल प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट दी गई है। साथ ही उसकी फ्रीज़ की गई संपत्तियों को जारी करने और करीब 300 अरब डॉलर के दीर्घकालिक विकास ढांचे पर चर्चा का प्रस्ताव शामिल है।
लेबनान के बफ़र ज़ोन को लेकर इसराइल का क्या रुख है?
इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू और उनके विदेश मंत्री गिदोन सार ने स्पष्ट किया है कि जब तक उत्तरी इसराइल के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, उनकी सेना दक्षिणी लेबनान के लगभग 602 वर्ग किलोमीटर में फैले बफ़र ज़ोन से पीछे नहीं हटेगी।
संसाधन
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