अंतिम अद्यतन: 15 जुलाई 2026, रात 8:47 बजे
चिदंबरम की चेतावनी के बीच परिसीमन विधेयक की चाबी द्रमुक और पवार गुट के हाथ
भारत की संसदीय राजनीति में आगामी मानसून सत्र का सबसे बड़ा टकराव महिला आरक्षण से जुड़े परिसीमन प्रस्ताव पर बनता दिख रहा है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट और द्रमुक से प्रस्तावित संविधान संशोधन का समर्थन न करने की अपील की है। दूसरी ओर, सरकार समर्थक खेमे का दावा है कि सीटें बढ़ाने से बड़े निर्वाचन क्षेत्रों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलेगा। अभी विधेयक का अंतिम स्वरूप और दोनों दलों का औपचारिक फैसला सामने नहीं आया है।

सुर्खियों के पीछे की कहानी
विवाद का केंद्र 131वां संविधान संशोधन विधेयक है, जिसे अप्रैल 2026 में लोकसभा की मंजूरी नहीं मिल सकी थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, विधेयक में लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने, निर्वाचन क्षेत्रों का नया परिसीमन करने और 2029 में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के प्रावधान थे। 17 अप्रैल के मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े थे।
चिदंबरम का कहना है कि महिलाओं के आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान 106वें संशोधन के माध्यम से पहले ही किया जा चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि नए प्रस्ताव के जरिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का रास्ता खोला जा रहा है, जिससे जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान हो सकता है। उनके विस्तृत दावे चिदंबरम की सार्वजनिक अपील में सामने आए हैं।
घटनाक्रम कैसे आगे बढ़ा
पिछले मतदान के बाद लोकसभा का राजनीतिक गणित बदलने की खबरें हैं। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के कुछ सांसदों के पाला बदलने के कारण सरकार समर्थक संख्या बढ़ी है, हालांकि अलग-अलग समाचार विवरणों में मौजूदा संख्या 318 से 324 के बीच बताई गई है। इसी कारण सटीक बहुमत का आंकड़ा सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की वास्तविक संख्या पर निर्भर करेगा।
शरद पवार गुट के पास आठ और द्रमुक के पास लोकसभा में 22 सांसद बताए गए हैं। इन दोनों दलों का समर्थन सरकार को दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचा सकता है। मतदान से अनुपस्थिति भी गणित बदल सकती है, क्योंकि संविधान संशोधन के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में दो-तिहाई समर्थन चाहिए। संसदीय संख्या बल के एक आकलन में पवार गुट के समर्थन के बाद भी सरकार को अतिरिक्त सांसदों की आवश्यकता बताई गई है।

द्रमुक ने पिछले सत्र में विधेयक का विरोध किया था। वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट की सांसद सुप्रिया सुले के बारे में प्रकाशित विवरण में कहा गया है कि पार्टी ने कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया और आधिकारिक प्रस्ताव देखने के बाद ही अपना रुख तय करेगी। सभी राज्यों की सीटें समान अनुपात में बढ़ाने की शर्त इस चर्चा का प्रमुख बिंदु बनी हुई है।
नेताओं की राय और राजनीतिक प्रतिक्रिया
चिदंबरम ने कहा कि दोनों दलों ने पिछली बार विधेयक के वास्तविक उद्देश्य को समझकर समर्थन नहीं दिया था। उनके अनुसार, नए स्वरूप को समर्थन देना उस राजनीतिक अंतरात्मा से विश्वासघात होगा जिसने उन्हें पहले विरोध के लिए प्रेरित किया था।
परिसीमन जरूरी है, ताकि बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को न्याय मिल सके और विकास का लाभ उन तक प्रभावी ढंग से पहुंचे।
शिंदे ने बताया कि कई लोकसभा क्षेत्रों की आबादी अब 20 से 25 लाख तक पहुंच गई है, जिससे सांसदों के लिए स्थानीय विकास आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा करना कठिन होता जा रहा है। प्रियंका चतुर्वेदी ने भी सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत आनुपातिक बढ़ोतरी के प्रस्ताव को निष्पक्ष बताते हुए दलों से अपने रुख पर दोबारा विचार करने की बात कही है।
देश की राजनीति पर व्यापक असर
यह विवाद केवल महिलाओं के आरक्षण तक सीमित नहीं है। परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों की संख्या का दोबारा निर्धारण है। यदि सीटों का वितरण मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर बदला गया, तो अलग-अलग राज्यों की राष्ट्रीय राजनीति में हिस्सेदारी भी बदल सकती है। यही कारण है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के संभावित नुकसान का प्रश्न विपक्ष के तर्कों के केंद्र में है।

सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं और प्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ गई है। विपक्ष का जोर इस बात पर है कि सीटों की वृद्धि ऐसी हो जिसमें किसी राज्य का प्रभाव कम न हो। भारतीय मतदाताओं के लिए इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य में उनके निर्वाचन क्षेत्र का आकार, सांसदों की संख्या और संसद में उनके राज्य की हिस्सेदारी बदल सकती है।
अब आगे क्या होगा
सरकार की योजना मानसून सत्र के दौरान दलों से बातचीत जारी रखने और विधेयक को अगले महीने के पहले सप्ताह में पेश करने की बताई गई है। हालांकि विधेयक का आधिकारिक अंतिम मसौदा उपलब्ध होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अप्रैल वाले प्रस्ताव में क्या बदलाव किए गए हैं।
द्रमुक, पवार गुट और अन्य विपक्षी दल समर्थन, विरोध या मतदान से दूरी में से कौन-सा रास्ता चुनते हैं, उसी से विधेयक का भविष्य तय होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पी. चिदंबरम ने द्रमुक और पवार गुट से क्या अपील की?
उन्होंने दोनों दलों से 131वें संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन न करने और पिछले सत्र के अपने रुख पर कायम रहने को कहा है।
अप्रैल 2026 में विधेयक क्यों नहीं पारित हुआ?
विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े, लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन नहीं मिला।
प्रस्ताव में लोकसभा की कितनी सीटें करने की बात थी?
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था।
द्रमुक का फैसला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
द्रमुक के लोकसभा में 22 सांसद बताए गए हैं। उसका समर्थन या मतदान से अनुपस्थित रहना, दोनों बहुमत के आंकड़े को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या पवार गुट ने समर्थन का अंतिम फैसला कर लिया है?
नहीं। सुप्रिया सुले से जुड़े प्रकाशित बयान के अनुसार, पार्टी आधिकारिक प्रस्ताव का अध्ययन करने के बाद फैसला करेगी।
परिसीमन से आम मतदाता पर क्या असर पड़ सकता है?
निर्वाचन क्षेत्र की सीमा, मतदाताओं की संख्या, सांसदों की कुल संख्या और संसद में राज्य का प्रतिनिधित्व बदल सकता है।
संसाधन
इस लेख में उद्धृत स्रोत और संदर्भ।
