मंगल ग्रह पर 4.1 अरब साल पहले पानी मौजूद था, इसका नया वैज्ञानिक प्रमाण सहारा रेगिस्तान में मिले एक दुर्लभ उल्कापिंड से सामने आया है। तेगाजा 001 नाम की इस गुलाबी चट्टान में ऐसे खनिज मिले हैं, जिनकी रासायनिक संरचना बताती है कि शुरुआती मंगल की सतह के नीचे पानी बहता था। वर्ष 2022 में माली के सहारा क्षेत्र में मिले इसके आठ टुकड़ों का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने मंगल के शुरुआती भूगर्भीय इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की है। यह खोज प्राचीन मंगल पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियों को समझने में भी मदद कर सकती है, हालांकि इससे वहां जीवन होने की पुष्टि नहीं होती।

वैज्ञानिकों ने क्या बड़ी उपलब्धि हासिल की?
तेगाजा 001 को पृथ्वी पर मिले मंगल ग्रह के सबसे पुराने ज्ञात उल्कापिंडों में शामिल किया जा रहा है। इसकी अनुमानित उम्र कम से कम 4.1 अरब साल है। यह वह दौर था जब मंगल ग्रह अपने शुरुआती भूगर्भीय विकास से गुजर रहा था। इस चट्टान की खासियत यह है कि इसमें मंगल की बाहरी चट्टानी परत और अंदरूनी मेंटल, दोनों के निर्माण से जुड़े संकेत सुरक्षित हैं।
शोधकर्ताओं ने इसके आठ टुकड़ों की पहचान की है। सबसे बड़ा टुकड़ा लगभग इंसान की मुट्ठी के आकार का है। पूरी चट्टान का वजन लगभग 800 ग्राम बताया गया है। इसका गुलाबी रंग भी इसे दूसरे सामान्य पत्थरों से अलग पहचान देता है। इसका नाम माली की एक प्राचीन, परित्यक्त नमक खनन बस्ती तेघाजा के नाम पर रखा गया है, जो इसके मिलने वाले स्थान के नजदीक स्थित है।
29 अक्टूबर 2026 को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित अध्ययन ने इस खोज को विस्तार से सामने रखा। शोधकर्ताओं के अनुसार, पृथ्वी पर अब तक लगभग 435 मंगल ग्रह के उल्कापिंडों की पहचान की जा चुकी है। इनमें शुरुआती मंगल के इतिहास से जुड़े नमूने बेहद कम हैं। तेगाजा 001 की उम्र इसे इस दुर्लभ श्रेणी में विशेष स्थान देती है।
इस शोध की जानकारी दैनिक जागरण की रिपोर्ट में भी दी गई है।
यह उल्कापिंड कैसे काम करता है वैज्ञानिक सबूत के रूप में?
तेगाजा 001 एक आग्नेय चट्टान है। इसका निर्माण तब हुआ, जब मंगल ग्रह के भीतर मौजूद पिघला हुआ चट्टानी पदार्थ सतह के नीचे ठंडा होकर ठोस बना। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस प्रक्रिया के दौरान गर्म चट्टानों का पानी के संपर्क में आना इस नमूने की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। पानी के साथ हुई रासायनिक प्रतिक्रियाओं ने चट्टान के खनिजों में ऐसे निशान छोड़े, जिन्हें अरबों साल बाद भी प्रयोगशाला में पहचाना जा सकता है।
वैज्ञानिकों को चट्टान में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अलग-अलग समस्थानिक मिले। इनकी संरचना का अध्ययन करने से पता चला कि पानी ने चट्टान के निर्माण और खनिजों में बदलाव की प्रक्रिया को प्रभावित किया था। इसका अर्थ है कि मंगल की बाहरी चट्टानी परत से पानी नीचे की ओर पहुंच रहा था और गर्म चट्टानी पदार्थों के संपर्क में आ रहा था।
इस अध्ययन में उम्र निर्धारित करने के लिए जिरकॉन क्रिस्टल का भी इस्तेमाल किया गया। इन छोटे खनिजों में मौजूद यूरेनियम बेहद धीमी रेडियोधर्मी प्रक्रिया के जरिए लेड में बदलता है। दोनों तत्वों के अनुपात का विश्लेषण करके वैज्ञानिक खनिज के बनने का समय निर्धारित कर सकते हैं। इसी विधि से तेगाजा 001 की उम्र कम से कम 4.1 अरब साल आंकी गई।
- उल्कापिंड
- अंतरिक्ष से आया चट्टानी या धात्विक टुकड़ा, जो किसी ग्रह के वातावरण से गुजरकर उसकी सतह पर पहुंचता है।
- समस्थानिक
- एक ही रासायनिक तत्व के ऐसे रूप जिनमें न्यूट्रॉन की संख्या अलग होती है। इनका अध्ययन चट्टानों के इतिहास को समझने में मदद करता है।
- जिरकॉन
- एक खनिज क्रिस्टल, जिसका उपयोग यूरेनियम और लेड के अनुपात के आधार पर चट्टानों की उम्र जानने में किया जाता है।

अध्ययन में अब तक क्या प्रमाणित हुआ?
शोध में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि शुरुआती मंगल पर पानी की गतिविधि केवल सतह तक सीमित नहीं थी। चट्टान के खनिजों में मिले रासायनिक संकेत बताते हैं कि पानी ग्रह की बाहरी परत में प्रवेश कर रहा था और वहां मौजूद गर्म चट्टानों के साथ प्रतिक्रिया कर रहा था। इस तरह तेगाजा 001 मंगल के प्राचीन जल इतिहास और भूगर्भीय विकास के बीच संबंध स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण नमूना बन गया है।
नासा की जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला के ग्रह वैज्ञानिक यांग लियू ने इस शोध का नेतृत्व किया। उनके अनुसार, यह उल्कापिंड शुरुआती मंगल की ऐसी तस्वीर पेश करता है, जब ग्रह आज की तुलना में अधिक गर्म और नम था। अध्ययन में एलिसिया क्रूज़-उरीबे ने भी योगदान दिया।
शोधकर्ताओं ने इस नमूने की खनिज संरचना को मंगल के दक्षिणी उच्चभूमि क्षेत्र में देखी गई सामग्री से मिलता-जुलता पाया है। मंगल टोही ऑर्बिटर ने इस क्षेत्र का अवलोकन किया है। इससे वैज्ञानिकों को उल्कापिंड की संभावित उत्पत्ति के क्षेत्र को समझने में मदद मिलती है।
हालांकि, पानी के प्रमाण को जीवन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अमर उजाला की रिपोर्ट में भी स्पष्ट किया गया है कि अध्ययन मंगल पर कभी सूक्ष्मजीवों के अस्तित्व की पुष्टि नहीं करता। यह केवल उन पर्यावरणीय परिस्थितियों के बारे में जानकारी देता है, जो जीवन के लिए अनुकूल हो सकती थीं।

यह खोज किन सवालों के जवाब दे सकती है?
मंगल ग्रह के इतिहास को समझने में वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह पता लगाना है कि वहां पानी कब और किन परिस्थितियों में मौजूद था। आज मंगल ठंडा और शुष्क ग्रह है, लेकिन उसके भूगर्भीय स्वरूप में प्राचीन जल गतिविधियों के संकेत मौजूद हैं। तेगाजा 001 इन संकेतों को प्रयोगशाला में जांचे जा सकने वाले ठोस खनिज प्रमाणों से जोड़ता है।
इस खोज से वैज्ञानिकों को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है:
- मंगल की शुरुआती भू-पर्पटी के निर्माण और उसके रासायनिक विकास को समझना।
- यह पता लगाना कि प्राचीन पानी ने ग्रह की चट्टानों और खनिजों को किस तरह बदला।
- अरबों साल पहले मंगल पर जीवन के अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों की पहचान करना।
- मंगल के दूसरे उल्कापिंडों और अंतरिक्ष अभियानों से प्राप्त नमूनों की तुलना करना।
भारतीय पाठकों के लिए भी यह खोज अंतरिक्ष विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि पृथ्वी के पड़ोसी ग्रह का अतीत वर्तमान स्थिति से कितना अलग हो सकता है। साथ ही, ग्रहों पर पानी की मौजूदगी और जीवन की संभावनाओं पर भविष्य के वैज्ञानिक अध्ययनों को दिशा मिल सकती है।
आगे किन वैज्ञानिक चुनौतियों का समाधान जरूरी है?
तेगाजा 001 से मिले प्रमाण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मंगल पर जीवन की मौजूदगी का सवाल अभी अनुत्तरित है। पानी की उपस्थिति और जीवन का अस्तित्व दो अलग-अलग वैज्ञानिक प्रश्न हैं। इस नमूने में पानी से जुड़ी रासायनिक प्रतिक्रियाओं के संकेत मिले हैं, लेकिन इसमें प्राचीन जीवों के अवशेष या जैविक गतिविधि की पुष्टि करने वाला प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।
आगे शोधकर्ताओं को इस चट्टान की संरचना की तुलना मंगल के अन्य उल्कापिंडों और ग्रह की सतह से प्राप्त आंकड़ों से करनी होगी। इसके संभावित उत्पत्ति क्षेत्र की बेहतर पहचान और खनिजों के निर्माण के दौरान हुई रासायनिक प्रक्रियाओं को समझना भी जरूरी होगा।
एक अन्य सवाल यह है कि यह चट्टान मंगल से निकलकर पृथ्वी तक कब पहुंची। वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी बड़े प्रभाव के कारण यह मंगल की सतह से अंतरिक्ष में उछली होगी। इसके बाद अंतरिक्ष में यात्रा करते हुए पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करके सहारा क्षेत्र में गिरी। हालांकि, पृथ्वी पर इसके पहुंचने का सटीक समय अभी ज्ञात नहीं है।
तेगाजा 001 ने मंगल के 4.1 अरब साल पुराने इतिहास की एक दुर्लभ झलक जरूर दी है। लेकिन यह खोज किसी अंतिम निष्कर्ष के बजाय उन वैज्ञानिक प्रमाणों को मजबूत करती है, जिनके जरिए शोधकर्ता लाल ग्रह के प्राचीन पर्यावरण और जीवन की संभावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तेगाजा 001 उल्कापिंड क्या है?
तेगाजा 001 मंगल ग्रह से आया लगभग 4.1 अरब साल पुराना उल्कापिंड है, जिसके आठ टुकड़े माली के सहारा क्षेत्र में मिले थे।
मंगल ग्रह का यह उल्कापिंड कहां मिला था?
इसके टुकड़े वर्ष 2022 में अफ्रीकी देश माली के सहारा क्षेत्र में मिले थे। खोज का स्थान बीर चाली गांव के पास बताया गया है।
वैज्ञानिकों को उल्कापिंड में पानी का सबूत कैसे मिला?
चट्टान में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अलग-अलग समस्थानिक मिले। इनके रासायनिक विश्लेषण से प्राचीन पानी के साथ चट्टानों की प्रतिक्रिया के संकेत मिले।
तेगाजा 001 की उम्र कितनी है?
जिरकॉन क्रिस्टल में यूरेनियम और लेड के अनुपात का अध्ययन करके इसकी उम्र कम से कम 4.1 अरब साल निर्धारित की गई।
क्या इस खोज से मंगल पर जीवन होने की पुष्टि हुई है?
नहीं। यह खोज प्राचीन पानी और जीवन के अनुकूल परिस्थितियों के संकेत देती है, लेकिन मंगल पर जीवन होने का प्रमाण नहीं देती।
मंगल से उल्कापिंड पृथ्वी तक कैसे पहुंचते हैं?
किसी बड़े अंतरिक्षीय पिंड की टक्कर से मंगल की चट्टानें अंतरिक्ष में उछल सकती हैं। इनमें से कुछ टुकड़े यात्रा करके पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते हैं और सतह पर गिरते हैं।
स्रोत: साइंस पत्रिका में प्रकाशित शोध की जानकारी और नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण तथा अमर उजाला की रिपोर्टें।