प्याज के दामों में गिरावट से किसानों का गुस्सा फूटा — कई राज्यों में प्रदर्शन तेज
मंडियों में प्याज की बोरियां लगी हैं, लेकिन खरीदारों के चेहरे गायब दिख रहे हैं। कहीं किसान सड़क पर प्याज फेंक रहे हैं, तो कहीं बोरियों पर माला चढ़ाकर प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि दी जा रही है। महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक एक ही शिकायत सुनाई दे रही है — लागत निकलना तो दूर, कई किसानों को दो रुपये किलो तक का भाव मिल रहा है। इसी दबाव के बीच अब सरकार पर खरीद बढ़ाने और बाजार में दखल देने का दबाव भी तेज हो गया है।

घटनाक्रम कैसे यहां तक पहुंचा
इस बार कई राज्यों में प्याज की पैदावार अच्छी रही। आम तौर पर यह किसानों के लिए राहत की खबर होती, लेकिन ज्यादा उत्पादन ने बाजार का संतुलन बिगाड़ दिया। मंडियों में आवक बढ़ी और कीमतें तेजी से नीचे चली गईं। कई किसानों का कहना है कि जहां लागत करीब 20 रुपये प्रति किलो बैठ रही है, वहीं बाजार में उन्हें 2 से 5 रुपये किलो तक का भाव मिल रहा है।
महाराष्ट्र के नासिक इलाके में किसानों ने सड़क जाम कर प्रदर्शन किया। विपक्षी नेताओं की हिरासत की खबरों ने इस आंदोलन को और राजनीतिक रंग दे दिया। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों ने प्याज की बोरियों पर माला पहनाकर विरोध जताया। ऊंट के मुंह में जीरा जैसी स्थिति बताकर किसान कह रहे हैं कि राहत की घोषणाएं जमीन पर असर नहीं दिखा रहीं।
उत्तर प्रदेश के जालौन से भी ऐसी ही तस्वीर सामने आई। वहां किसानों ने कहा कि मंडियों में खरीदार कम हैं और ट्रांसपोर्ट का खर्च भी जेब पर भारी पड़ रहा है। अगर किसान माल वापस घर ले जाए तो नुकसान, और बेच दे तो भी घाटा। यही वजह है कि अब नाराजगी खुले प्रदर्शन में बदल रही है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले तक खुदरा बाजार में प्याज महंगा होने पर सरकार दबाव में थी। तब निर्यात नियंत्रण और स्टॉक सीमा जैसे कदम उठाए गए थे। अब हालात उलट चुके हैं। ज्यादा सप्लाई और कमजोर खरीद ने किसानों की कमर तोड़ दी है।
असल वजह क्या है
प्याज भारत की सबसे संवेदनशील फसलों में गिनी जाती है। थोड़ी कमी हो तो शहरों में कीमतें आग पकड़ लेती हैं, और ज्यादा उत्पादन हो जाए तो किसानों को लागत भी नहीं मिलती। इस बार मौसम ने उत्पादन बढ़ाने में मदद की, लेकिन भंडारण और प्रोसेसिंग की कमजोर व्यवस्था सामने आ गई। किसान तुरंत माल बेचने को मजबूर हुए क्योंकि लंबे समय तक स्टोर करना हर किसी के बस की बात नहीं।
इसी बीच सरकार पर दबाव बढ़ने के बाद केंद्रीय एजेंसियों एनएएफईडी और एनसीसीएफ के जरिए सीधे खरीद बढ़ाने की बात सामने आई है। महाराष्ट्र के किसान नेताओं की गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद यह संकेत मिला कि सरकारी खरीद कुछ राहत दे सकती है। अगर यह खरीद तेजी से शुरू होती है, तो बाजार में न्यूनतम समर्थन जैसा माहौल बन सकता है।

अगर आप खेती और खाद्य बाजार पर नजर रखते हैं, तो आपको याद होगा कि 2023 और 2024 में भी प्याज को लेकर ऐसी ही उठा-पटक देखी गई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि तब उपभोक्ता परेशान थे, अब किसान। यही भारतीय कृषि बाजार की सबसे बड़ी विडंबना मानी जाती है।
सरकार और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
महाराष्ट्र सरकार ने संकेत दिए हैं कि केंद्र के साथ मिलकर खरीद और राहत उपायों पर काम किया जा रहा है। किसान संगठनों का कहना है कि सिर्फ घोषणा से काम नहीं चलेगा, मंडियों में तुरंत खरीद शुरू होनी चाहिए।
किसानों को राहत देने के लिए सरकारी एजेंसियों की सीधी खरीद जरूरी है।
कृषि बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या सिर्फ इस सीजन की नहीं है। भारत में प्याज जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलों के लिए मजबूत कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग नेटवर्क अभी भी कमजोर है। जब उत्पादन बढ़ता है तो किसान के पास बेचने के अलावा विकल्प कम बचते हैं।
उधर कुछ राजनीतिक दल इस मुद्दे को विधानसभा और संसद तक ले जाने की तैयारी में हैं। महाराष्ट्र में यह मामला खास तौर पर बड़ा बनता दिख रहा है क्योंकि नासिक क्षेत्र देश के सबसे बड़े प्याज उत्पादक इलाकों में गिना जाता है।
इसका असर कितना बड़ा हो सकता है
कम कीमत सुनने में शहर के उपभोक्ताओं के लिए राहत जैसी लग सकती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है। अगर किसानों को लगातार घाटा होता रहा, तो अगले सीजन में खेती कम हो सकती है। फिर वही बाजार अचानक महंगा हो जाएगा। यानी आज की सस्ती प्याज कल की महंगाई की जमीन भी तैयार कर सकती है।
जैसी करनी वैसी भरनी वाली कहावत यहां कृषि नीति पर भी फिट बैठती है। लंबे समय तक अगर भंडारण और बाजार सुधार पर काम नहीं हुआ, तो हर दो-तीन साल में यही संकट लौटता रहेगा।

भारत के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोग भी इससे सीधे जुड़े हैं। प्याज सिर्फ एक सब्जी नहीं, रोजमर्रा की रसोई का हिस्सा है। इसलिए इसकी कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव राजनीति, महंगाई और गांव की अर्थव्यवस्था तीनों को प्रभावित करता है।
अब आगे क्या
फिलहाल सबसे बड़ी नजर सरकारी खरीद पर है। अगर एनएएफईडी और एनसीसीएफ बड़े पैमाने पर खरीद शुरू करती हैं, तो किसानों को कुछ राहत मिल सकती है। राज्य सरकारें भी परिवहन और भंडारण सहायता पर विचार कर रही हैं।
किसान संगठनों ने साफ कहा है कि अगर जल्द ठोस कदम नहीं उठे, तो आंदोलन और बड़ा हो सकता है। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि प्याज का यह संकट सिर्फ मंडियों तक सीमित रहेगा या फिर राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्याज के दाम अचानक इतने नीचे क्यों चले गए?
इस बार कई राज्यों में उत्पादन ज्यादा हुआ और मंडियों में सप्लाई बढ़ गई। खरीद कमजोर रहने और भंडारण की सीमाओं के कारण कीमतें तेजी से गिर गईं।
किसानों को कितना नुकसान हो रहा है?
कई किसानों का कहना है कि उनकी लागत करीब 20 रुपये किलो तक पड़ रही है, जबकि मंडियों में 2 से 5 रुपये किलो तक के भाव मिल रहे हैं। इससे सीधा घाटा हो रहा है।
एनएएफईडी और एनसीसीएफ क्या करती हैं?
ये सरकारी एजेंसियां हैं जो जरूरत पड़ने पर किसानों से सीधे खरीद करती हैं। इसका मकसद बाजार में कीमतों को संभालना और किसानों को राहत देना होता है।
क्या उपभोक्ताओं को सस्ती प्याज मिल रही है?
कुछ शहरों में खुदरा कीमतों में राहत दिख रही है, लेकिन मंडी और खुदरा बाजार के बीच बड़ा अंतर अभी भी बना हुआ है। पूरा फायदा हर जगह ग्राहकों तक नहीं पहुंचा।
क्या यह संकट आगे महंगाई बढ़ा सकता है?
अगर किसानों ने अगले सीजन में कम खेती की, तो भविष्य में सप्लाई घट सकती है। इससे बाद में कीमतें अचानक बढ़ने का खतरा रहता है।
सबसे ज्यादा असर किन राज्यों में दिख रहा है?
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा विरोध और संकट की खबरें सामने आई हैं। खास तौर पर नासिक क्षेत्र इस मुद्दे का केंद्र बना हुआ है।
Resources
Sources and references cited in this article.
