भारतीय वायुसेना ने 97% लड़ाकू विमान पुर्जों का किया स्वदेशीकरण
लड़ाकू विमान तभी लगातार उड़ सकते हैं, जब उनके टायर, बैटरियां, पैराशूट, पंप और दूसरे जरूरी पुर्जे समय पर उपलब्ध हों। भारतीय वायुसेना ने इसी मोर्चे पर बड़ा बदलाव करते हुए रोजमर्रा के परिचालन में इस्तेमाल होने वाले 97 प्रतिशत लड़ाकू विमान पुर्जों का देश में निर्माण शुरू कर दिया है। मेंटेनेंस कमांड लगभग 62,300 पुर्जों को भारत में बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है और पिछले पांच वर्षों में इससे 582 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचने की जानकारी दी गई है। यह बदलाव सुखोई-30एमकेआई, मिग-29 और दूसरे विदेशी मूल के विमानों वाले बड़े बेड़े के लिए आपूर्ति बाधाओं का जोखिम घटाने की दिशा में अहम कदम है।

एक नजर में पूरी तस्वीर
न्यूज़18 हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार वायुसेना ने बैटरियों, लड़ाकू विमान टायरों, पायलट पैराशूट, पावर कार्ट, इजेक्शन प्रणाली से जुड़े विस्फोटक घटकों और सुखोई-30एमकेआई के हाइड्रोलिक बूस्टर पंप तक का स्वदेशीकरण किया है। बेड़े की विकेंद्रीकृत मरम्मत के लिए जरूरी अनिवार्य पुर्जों में भी 93 प्रतिशत का घरेलू उत्पादन हासिल किया गया है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि दैनिक उड़ान और रखरखाव के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं का बड़ा हिस्सा अब विदेशी विक्रेताओं की समयसीमा पर निर्भर नहीं है। हालांकि इंजन, विशेष एवियोनिक्स, बड़े समुच्चय और कुछ खास मरम्मत सहायता के लिए विदेशी सहयोग की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
यह बदलाव कैसे आगे बढ़ा
भारतीय वायुसेना लंबे समय से रूसी, फ्रांसीसी और स्वदेशी विमानों का मिश्रित बेड़ा संचालित करती है। सुखोई-30एमकेआई, मिग-29, मिग-17 हेलीकॉप्टर और एएन-32 जैसे रूसी मूल के मंचों के साथ मिराज-2000 और राफेल जैसे फ्रांसीसी विमान भी इसके बेड़े में हैं। विदेशी मूल के इतने विविध विमानों के कारण पुर्जों और विशेष मरम्मत की आपूर्ति स्वाभाविक रूप से कई देशों और कंपनियों से जुड़ी रही है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद एयरो-इंजन, एवियोनिक्स और विशेष हथियार प्रणालियों को विदेश भेजकर मरम्मत कराने में बाधाएं सामने आने की जानकारी दी गई। इसके जवाब में वायुसेना ने रूस में बने विमानों, इंजनों, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों और युद्धक उपकरणों की मरम्मत, जीवन-विस्तार और ओवरहॉल की अधिक क्षमता भारत में विकसित करने पर जोर बढ़ाया।

इसके साथ 2022 में शुरू की गई त्रि-आयामी मुद्रण सुविधा का उपयोग मांग के अनुसार जरूरी पुर्जे बनाने में किया जा रहा है। निजी उद्योग के साथ साझेदारी बढ़ाकर बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन की तैयारी भी चल रही है।
मुख्य विमान, लोग और आंकड़े
सुखोई-30एमकेआई इस पूरी कहानी के केंद्र में है क्योंकि वायुसेना के पास इसके लगभग 260 विमान होने की जानकारी विभिन्न स्रोतों में दी गई है। यह भारी, दो इंजन वाला लड़ाकू विमान लगभग 8,000 किलोग्राम तक हथियार और मिशन उपकरण ले जा सकता है। ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र के साथ इसका संयोजन लंबी दूरी के प्रहार में इसकी भूमिका को और बढ़ाता है।

एक अन्य रिपोर्ट में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक संयंत्र में 12 नए सुखोई-30एमकेआई बनाने और उनमें 50 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल करने की योजना बताई गई है। साथ ही प्रस्तावित उन्नयन में नए रडार, एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और स्वदेशी हथियार जोड़ने की योजना का उल्लेख है।
प्रतिक्रिया और जवाब
वायुसेना की ओर से सामने आई जानकारी में नवाचार और निजी उद्योग की भागीदारी को इस स्वदेशीकरण का प्रमुख आधार बताया गया है। पिछले दो वित्त वर्षों में घरेलू पूंजीगत बजट खर्च की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत तक पहुंचने की भी जानकारी दी गई है।
यह रक्षा उद्योग के लिए केवल खरीद का मामला नहीं है। हजारों अलग-अलग पुर्जों का स्थानीय उत्पादन तैयार होने से मरम्मत, परीक्षण, निर्माण और आपूर्ति से जुड़ा घरेलू तंत्र अधिक गहरा होता है। युद्ध या अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधा के समय यही क्षमता विमानों की उपलब्धता बनाए रखने में मदद कर सकती है।
अब किन बातों पर नजर रहेगी
अगला महत्वपूर्ण सवाल उन जटिल हिस्सों का है जिनके लिए अभी भी विदेशी आपूर्ति या विशेषज्ञ सहायता चाहिए। इंजन, महत्वपूर्ण एवियोनिक्स और विशेष मरम्मत प्रणालियों का कितना हिस्सा भारत में स्थानांतरित होता है, इससे वास्तविक आत्मनिर्भरता की अगली सीमा तय होगी।
इसके अलावा 12 नए सुखोई-30एमकेआई विमानों का उत्पादन, प्रस्तावित उन्नयन और निजी उद्योग के साथ बड़े पैमाने पर पुर्जों का निर्माण इस प्रक्रिया की गति दिखाएंगे। वायुसेना के लिए चुनौती केवल पुर्जे बनाना नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता और उपलब्धता को लगातार परिचालन स्तर पर बनाए रखना भी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारतीय वायुसेना ने कितने लड़ाकू विमान पुर्जों का स्वदेशीकरण किया है?
रोजमर्रा के परिचालन में इस्तेमाल होने वाले लगभग 97 प्रतिशत लड़ाकू विमान पुर्जों का देश में निर्माण शुरू किया गया है।
भारत में कितने अलग-अलग वायुसेना पुर्जे बनाए जा रहे हैं?
मेंटेनेंस कमांड लगभग 62,300 प्रकार के पुर्जों को भारत में बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है।
इस स्वदेशीकरण से कितनी बचत हुई है?
रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षों में विदेशी मुद्रा के रूप में 582 करोड़ रुपये की बचत हुई है।
क्या विदेशी पुर्जों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो गई है?
नहीं। कुछ इंजन, एवियोनिक्स, बड़े समुच्चय और विशेष मरम्मत सहायता के लिए अभी भी विदेशी आपूर्ति की जरूरत है।
सुखोई-30एमकेआई पर इतना जोर क्यों है?
वायुसेना के पास लगभग 260 सुखोई-30एमकेआई हैं और यह भारी हथियार, लंबी दूरी तथा बहु-भूमिका अभियानों के लिए प्रमुख मंच है। इसलिए इसके पुर्जों और उन्नयन की घरेलू क्षमता परिचालन उपलब्धता से सीधे जुड़ी है।
संसाधन
इस लेख में उद्धृत स्रोत और संदर्भ।
