अधिकमास में दो तारीखों का पेच: 14 जून श्राद्ध, 15 जून सोमवती अमावस्या
12:19 बजे से शुरू हो रही अमावस्या तिथि ने इस बार श्रद्धालुओं के सामने एक जरूरी फर्क रख दिया है: पितृ कर्म का दिन अलग है और सोमवती अमावस्या का व्रत अलग। अधिकमास में पड़ने के कारण यह संयोग धार्मिक पंचांग देखने वालों के लिए और खास माना जा रहा है। इसलिए इस सप्ताह पूजा, तर्पण, स्नान-दान और व्रत की तैयारी कर रहे परिवारों को तारीख और समय समझकर ही निर्णय लेना होगा।

सीधी बात
- अमावस्या तिथि 14 जून 2026 दोपहर 12:19 बजे शुरू होकर 15 जून सुबह 08:23 बजे समाप्त होगी।
- उदयातिथि के आधार पर सोमवती अमावस्या का व्रत और स्नान-दान 15 जून को माना गया है।
- श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे पितृ कर्म के लिए 14 जून दोपहर 12:19 बजे के बाद का समय बताया गया है।
- पितृ कर्म दोपहर में किए जाते हैं, इसलिए 15 जून को अमावस्या सुबह समाप्त होने से श्राद्ध के लिए 14 जून को उपयुक्त माना गया है।
- हरिद्वार में हर की पौड़ी, कुशा घाट, चंडी घाट, कनखल का शीतला माता घाट और नारायणी शिला मंदिर जैसे स्थान पितृ कर्म से जुड़े बताए गए हैं।
बात को समझें
अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है। धार्मिक मान्यता में इसे भगवान विष्णु से जोड़ा गया है और इस दौरान पूजा-पाठ, जप, तप, दान और व्रत को विशेष फलदायी माना गया है। इसी वजह से इस मास की अमावस्या सामान्य अमावस्या की तुलना में ज्यादा चर्चा में है।
इस बार उलझन तारीख की है। पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 14 जून को दोपहर 12:19 बजे शुरू होगी और 15 जून को सुबह 08:23 बजे समाप्त हो जाएगी। उदयातिथि के आधार पर अमावस्या 15 जून को मानी जाएगी, इसलिए सोमवती अमावस्या का व्रत उसी दिन रखा जाएगा। लेकिन पितृ कर्म आमतौर पर दोपहर के समय, लगभग 11 बजे के बाद किए जाते हैं। 15 जून को दोपहर तक अमावस्या तिथि नहीं रहेगी, इसलिए श्राद्ध अमावस्या 14 जून को मानी गई है। अमावस्या तिथि और श्राद्ध समय को लेकर यही फर्क सबसे अहम है।

पितृ कर्म करने वालों के लिए 14 जून को दोपहर 12:19 बजे के बाद शुरुआत करने और दोपहर 02:30 बजे तक कर्म पूरा करने की सलाह दी गई है। तर्पण की विधि में स्नान के बाद जल, काले तिल और कुशा के माध्यम से पितरों को अर्पण करने की बात कही गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कुशा के बिना तर्पण को पूर्ण नहीं माना जाता।
हरिद्वार से जुड़े धार्मिक संदर्भों में हर की पौड़ी का अस्थि प्रवाह घाट, कुशा घाट, नील धारा पर चंडी घाट यानी नमामि गंगे घाट, कनखल का प्राचीन शीतला माता घाट और देवपुरा के पास नारायणी शिला मंदिर का उल्लेख किया गया है। इन स्थानों पर पिंडदान, तर्पण, जलांजलि, तिलांजलि और पितृ गायत्री पाठ करने की मान्यता बताई गई है। हरिद्वार के पितृ कर्म स्थलों की चर्चा इसी संदर्भ में हुई है।
इसका असर क्यों है
भारत में बड़ी संख्या में परिवार अमावस्या पर पितरों के निमित्त तर्पण, दान और श्राद्ध करते हैं। ऐसे में 14 और 15 जून की अलग-अलग धार्मिक भूमिका समझना जरूरी है, क्योंकि गलत दिन पर कर्म करने से कई परिवार असमंजस में पड़ सकते हैं। यह खबर केवल पंचांग की तारीख नहीं, बल्कि उन लोगों की तैयारी से जुड़ी है जो पुजारी, घाट, यात्रा या घर में अनुष्ठान की व्यवस्था पहले से करते हैं।
सोमवती अमावस्या इसलिए भी अलग महत्व रखती है क्योंकि अमावस्या सोमवार को पड़ रही है। मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और पितरों की पूजा की जाती है। विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। पीपल वृक्ष की पूजा और परिक्रमा की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ी बताई गई है।

दान-पुण्य के स्तर पर भी इस बार गर्मी का संदर्भ सामने आता है। जल से भरा मटका, सत्तू, फल, अन्न, सूती वस्त्र, छाता, हाथ का पंखा और जूते-चप्पल दान करने की बात कही गई है। जरूरतमंदों को पानी उपलब्ध कराना या प्याऊ लगवाना भी पुण्यकारी माना गया है। यह पहलू धार्मिक अनुष्ठान को सामाजिक उपयोगिता से जोड़ता है।
अब आगे क्या होगा
11 जून को पुरुषोत्तम कमला एकादशी बताई गई है, जबकि 12 जून को प्रदोष व्रत और 27 जून को दूसरा मासिक प्रदोष व्रत रहेगा। 15 जून को सोमवती अमावस्या के साथ अधिकमास के अंतिम चरण की पूजा और स्नान-दान का क्रम रहेगा। कुछ विवरणों के अनुसार सोमवती अमावस्या के बाद प्रतिपदा से पुरुषोत्तम मास की समाप्ति मानी जाएगी और मल मास के बाद विवाह सहित मांगलिक कार्य शुरू होने का उल्लेख किया गया है।
15 जून को स्नान-दान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह करीब 04:03 से 04:43 बजे तक बताया गया है। कुछ पंचांग विवरणों में अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 05:23 से 07:08 बजे तक रहने की बात भी कही गई है। स्नान-दान और शुभ योग की तैयारी करने वाले परिवार अपने स्थानीय पंचांग और पुरोहित से समय मिलान कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अधिकमास की अमावस्या 2026 कब है?
अमावस्या तिथि 14 जून 2026 को दोपहर 12:19 बजे शुरू होकर 15 जून सुबह 08:23 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के आधार पर अमावस्या 15 जून को मानी गई है।
श्राद्ध और तर्पण 14 जून को क्यों बताए गए हैं?
श्राद्ध कर्म दोपहर में किए जाते हैं। 15 जून को अमावस्या सुबह खत्म हो जाएगी, इसलिए पितृ कर्म के लिए 14 जून दोपहर 12:19 बजे के बाद का समय बताया गया है।
सोमवती अमावस्या का व्रत किस दिन रखा जाएगा?
सोमवती अमावस्या का व्रत 15 जून 2026, सोमवार को रखा जाएगा, क्योंकि उदयातिथि के आधार पर उसी दिन अमावस्या मानी गई है।
पितृ कर्म के लिए कौन से स्थान बताए गए हैं?
हरिद्वार में हर की पौड़ी, कुशा घाट, चंडी घाट, कनखल का शीतला माता घाट और नारायणी शिला मंदिर जैसे स्थानों का उल्लेख पितृ कर्म से जुड़ा बताया गया है।
तर्पण में काले तिल और कुशा क्यों लिए जाते हैं?
धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान के बाद जल, काले तिल और कुशा से तर्पण दिया जाता है। कुशा के बिना तर्पण को पितरों तक पहुंचने वाला नहीं माना गया है।
सोमवती अमावस्या पर क्या दान बताया गया है?
जल से भरा मटका, सत्तू, फल, अन्न, सूती वस्त्र, छाता, हाथ का पंखा और जूते-चप्पल दान करने की बात कही गई है।
संसाधन
इस लेख में उद्धृत स्रोत और संदर्भ।

