सायोनी घोष का नाम आते ही तृणमूल संकट दिल्ली तक पहुंचा
अंतिम अद्यतन: 10 जून 2026, शाम 7:05 बजे
जादवपुर से सांसद सायोनी घोष, जिन्हें कभी ममता बनर्जी के सबसे आक्रामक युवा चेहरों में गिना जाता था, अब उन्हीं सांसदों की सूची में बताई जा रही हैं जिन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को अलग संसदीय गुट के लिए पत्र सौंपा है। यह नाम इसलिए चौंकाता है क्योंकि घोष ने विधानसभा चुनाव प्रचार में तृणमूल कांग्रेस का सबसे मुखर बचाव किया था। अब पार्टी के भीतर विधायक दल से शुरू हुआ संकट संसदीय दल तक फैलता दिख रहा है। उपलब्ध सूचनाओं के मुताबिक, विवाद का केंद्र 19 से 20 सांसदों के दावे, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन और दलबदल कानून की गणित पर आकर टिक गया है।

अब तक सामने आई तस्वीर
कई रिपोर्टों में दावा है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के एक गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र देकर संसद में अलग व्यवस्था या अलग गुट की मान्यता की मांग की है। कुछ विवरणों में संख्या 19 बताई गई है, जबकि कुछ में 20 सांसदों का दावा सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, इसलिए यह संख्या केवल राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि कानूनी गणित के लिहाज से भी अहम है।
बताई जा रही सूची में काकोली घोष दस्तीदार, यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा, सायोनी घोष, माला रॉय, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी, जून मालिया और कई अन्य नाम शामिल हैं। दावे के मुताबिक, यह गुट अभी औपचारिक रूप से पार्टी छोड़ने या भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बजाय अलग संसदीय गुट के तौर पर काम करना चाहता है। यही वह बिंदु है जहां मामला दलबदल विरोधी कानून से जुड़ता है।

ममता बनर्जी के साथ खड़े बताए जा रहे सांसदों में महुआ मोइत्रा, अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी, सौगात रॉय, सुदीप बंदोपाध्याय, प्रसून बनर्जी, प्रतिमा मंडल, सजदा अहमद और कीर्ति आजाद के नाम दिए गए हैं। दूसरी तरफ राज्यसभा में भी झटका लगा है। सुष्मिता देव ने बुधवार को पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दिया, जबकि इससे पहले सुखेंदु शेखर रॉय भी इस्तीफा दे चुके थे।
संकट की जड़ केवल संसद तक सीमित नहीं है। विधानसभा में भी अलग गुट का दावा सामने आया है। रिताब्रता बनर्जी ने कहा कि उनके साथ 64 विधायक हैं और संख्या बढ़ सकती है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी थी, जब उनके पास तृणमूल के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन बताया गया। यही वजह है कि पार्टी के भीतर यह संघर्ष अब केवल असंतोष नहीं, नेतृत्व और असली राजनीतिक पहचान की लड़ाई बन गया है।
बयानों में दिखती खाई
बागी खेमे के दावे में सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत राष्ट्रीय स्तर पर दिखता है। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले गुट के बारे में कहा गया है कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ आगे बढ़ना चाहता है। यह रुख विधानसभा वाले गुट से अलग है, जिसने राज्य में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक जगह न देने की बात कही थी।
हमने जनादेश को स्वीकार किया है और मानते हैं कि हमारा भविष्य का राजनीतिक रास्ता राजग के साथ होना चाहिए।
ममता बनर्जी के पक्ष से महुआ मोइत्रा ने बागियों के दावों पर सीधा सवाल उठाया। उनके अनुसार, अगर संख्या सचमुच इतनी बड़ी होती तो हस्ताक्षर और सार्वजनिक घोषणा सामने आती। उन्होंने दलबदल कानून की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल सांसद दल नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई हिस्से का अलग होना और विलय करना जरूरी होता है।
मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकती हूं कि उनके पास 20 सांसद नहीं हैं।
सायोनी घोष की स्थिति इसलिए खास है क्योंकि वह तृणमूल की युवा और महिला राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहीं। 2021 में आसनसोल दक्षिण से विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी ममता बनर्जी ने उन्हें युवा इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। 2024 में वह जादवपुर से लोकसभा पहुंचीं। उनके चुनावी हलफनामे में कुल संपत्ति करीब 91.9 लाख रुपये बताई गई थी, जिसमें दक्षिण कोलकाता के गोल्फ ग्रीन इलाके का घर, बैंक जमा, बीमा, नकद और होंडा जैज कार शामिल हैं; साथ ही करीब 59 लाख रुपये की देनदारी भी दर्ज थी।
भारत के पाठकों के लिए असर
यह घटनाक्रम केवल पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति नहीं है। संसद में तृणमूल कांग्रेस विपक्षी खेमे की अहम आवाज रही है, इसलिए उसके संसदीय दल में दरार राष्ट्रीय कानून-निर्माण, विपक्षी रणनीति और सत्ता पक्ष के संख्यात्मक आराम पर असर डाल सकती है। अगर कोई गुट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ मतदान करता है, तो कई संसदीय मुद्दों पर विपक्ष की सामूहिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

भारतीय मतदाता के लिए इसका बड़ा अर्थ यह है कि चुनावी जनादेश के बाद पार्टियों की आंतरिक स्थिरता भी उतनी ही निर्णायक हो जाती है जितनी सीटों की संख्या। तृणमूल के मामले में विधानसभा और लोकसभा, दोनों स्तरों पर अलग-अलग रास्ते दिख रहे हैं। राज्य में एक गुट भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने की बात करता है, जबकि संसद में दूसरा गुट उसी सत्ता गठबंधन के साथ चलने की तैयारी दिखाता है। यह विरोधाभास बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में और अस्थिर बना सकता है।
सायोनी घोष जैसे चेहरे का नाम आने से यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या युवा और प्रचारक चेहरों की नाराजगी संगठनात्मक उपेक्षा से जुड़ी है। कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि घोष पार्टी नेतृत्व से समर्थन न मिलने और चुनाव प्रचार के दौरान अकेला महसूस करने से नाराज थीं। हालांकि इस पर उनकी सार्वजनिक विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
आगे क्या होगा
अब निर्णायक निगाह लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर किसी प्रक्रिया, पत्र की स्थिति और सांसदों की सार्वजनिक पुष्टि पर रहेगी। जब तक पत्र और सभी हस्ताक्षर खुलकर सामने नहीं आते, संख्या को लेकर विवाद बना रहेगा। तृणमूल नेतृत्व की आधिकारिक प्रतिक्रिया भी इस संकट की दिशा तय करेगी।
राज्यसभा में सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफों के बाद पार्टी को उच्च सदन में भी अपनी स्थिति संभालनी होगी। विधानसभा गुट, संसदीय गुट और ममता बनर्जी के साथ बचे नेताओं के बीच अगली चालें यह तय करेंगी कि यह टूट अस्थायी दबाव है या तृणमूल कांग्रेस की संरचना में स्थायी बदलाव की शुरुआत।
एक नजर में
- सायोनी घोष का नाम तृणमूल कांग्रेस के कथित बागी सांसदों की सूची में बताया गया है।
- बागी सांसदों की संख्या को लेकर 19 और 20 दोनों दावे सामने आए हैं।
- तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, इसलिए दो-तिहाई संख्या का सवाल अहम है।
- सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर रॉय राज्यसभा और पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं।
- महुआ मोइत्रा ने बागियों के दावों पर सवाल उठाए हैं और संख्या साबित करने की बात कही है।
- विधानसभा में भी अलग गुट का दावा पार्टी के संकट को और व्यापक बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सायोनी घोष कौन हैं?
सायोनी घोष जादवपुर से लोकसभा सांसद हैं। वह बंगाली सिनेमा की अभिनेत्री और पार्श्व गायिका भी रही हैं और तृणमूल कांग्रेस के युवा चेहरों में शामिल थीं।
सायोनी घोष का नाम क्यों चर्चा में है?
उनका नाम उन सांसदों की सूची में बताया गया है जिन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को अलग संसदीय गुट के लिए पत्र देने का दावा किया है।
तृणमूल कांग्रेस के कितने सांसद बागी बताए जा रहे हैं?
रिपोर्टों में संख्या 19 से 20 के बीच बताई गई है। सभी नाम और पत्र सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हुए हैं।
ममता बनर्जी के साथ कौन-कौन सांसद बताए जा रहे हैं?
महुआ मोइत्रा, अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी, सौगात रॉय, सुदीप बंदोपाध्याय, प्रसून बनर्जी, प्रतिमा मंडल, सजदा अहमद और कीर्ति आजाद के नाम ममता बनर्जी के साथ बताए गए हैं।
दलबदल कानून इस मामले में क्यों अहम है?
क्योंकि अलग गुट को कानूनी राहत के लिए जरूरी संख्या और मान्यता का सवाल उठता है। तृणमूल के 28 लोकसभा सांसदों में दो-तिहाई संख्या करीब 19 होती है।
क्या बागी सांसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं?
उपलब्ध सामग्री के अनुसार, ऐसा औपचारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है। दावे अलग संसदीय गुट और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन से जुड़े हैं।
संसाधन
इस लेख में उद्धृत स्रोत और संदर्भ।
