9 सांसदों वाली शिवसेना यूबीटी पर संकट: 14 जून की बैठक से पहले बढ़ी हलचल
अद्यतन: 13 जून 2026, सुबह 6:49 बजे
उद्धव ठाकरे ने अपने सभी सांसदों को 14 जून को मातोश्री बुलाया है, और यही बैठक अब महाराष्ट्र की राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है। वजह सिर्फ अफवाहों की आवाजाही नहीं, बल्कि लोकसभा में संख्या बढ़ाने की एनडीए की खुली रणनीति से जुड़ी है। कई रिपोर्टों में दावा है कि शिवसेना यूबीटी के सांसदों का एक हिस्सा एकनाथ शिंदे के संपर्क में है, हालांकि पार्टी के नेताओं ने इन दावों को खारिज भी किया है।
यह मामला केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत यानी 360 सांसदों के आंकड़े की चर्चा ने इसे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। टीएमसी के 19 सांसदों के समर्थन के दावे के बाद शिवसेना यूबीटी पर नजरें और तेज हो गई हैं।
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अब तक क्या सामने आया
उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी के लोकसभा में 9 सांसद हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यता बचाने के लिए इनमें से कम से कम 6 सांसदों को किसी दूसरी पार्टी में विलय करना होगा। इसीलिए एकनाथ शिंदे की शिवसेना को संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि दिल्ली में एक केंद्रीय मंत्री के बंगले पर शिंदे और उद्धव गुट के सात सांसदों की बैठक हुई। उसी रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. श्रीकांत शिंदे पिछले छह महीनों से इन सांसदों से संपर्क बनाने के लिए पर्दे के पीछे सक्रिय बताए गए हैं। दिल्ली में हुई बैठक के दावे ने उद्धव खेमे की बेचैनी बढ़ाई है।
दूसरी तरफ, एबीपी न्यूज़ ने बताया कि उद्धव ठाकरे ने 14 जून को सभी सांसदों की आपात बैठक मातोश्री में बुलाई है। रिपोर्ट में संजय उर्फ बंडू जाधव की पिछली बैठकों से अनुपस्थिति और कुछ सांसदों की शिंदे गुट के नेताओं से मुलाकातों का जिक्र है। 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी ने मजबूत प्रदर्शन किया था; शिवसेना यूबीटी ने 9 सीटें जीती थीं, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना 7 सीटों पर रही थी।

लोकसभा का समीकरण इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि है। रिपोर्टों में मौजूदा लोकसभा को 540 सदस्यों वाली बताया गया है, जबकि 3 सीटें खाली हैं। संविधान संशोधन जैसे प्रस्तावों के लिए दो-तिहाई समर्थन की जरूरत के कारण एनडीए 360 के आंकड़े के करीब पहुंचना चाहता है। इसी कारण विपक्षी दलों के सांसदों को साथ लाने की कोशिशों पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं।
प्रतिक्रियाएं और जवाब
शिवसेना यूबीटी के भीतर टूट की चर्चाओं पर पार्टी सांसद अरविंद सावंत ने इसे अफवाह बताया। उन्होंने आईएएनएस से कहा कि आधिकारिक जानकारी के बिना इन चर्चाओं पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।
अफवाहों का सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं होता है। ऐसी स्थिति में मेरा आप लोगों से यही कहना है कि अफवाहों पर ध्यान न दें, जब तक किसी के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आ जाती।
सावंत ने यह भी कहा कि अगर कोई सांसद छोड़कर जाना चाहता है, तो पार्टी उसे रोक नहीं पाएगी। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि यह पूर्ण खंडन के साथ-साथ भीतर की राजनीतिक बेचैनी को भी दिखाता है।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में सांसद संजय दीना पाटील का बयान भी आया, जिसमें उन्होंने शिंदे के साथ जाने की बात से इनकार किया।
मैं उद्धव ठाकरे के साथ खुश हूं। मेरे एकनाथ शिंदे से अच्छे सम्बन्ध हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं उनके साथ जा रहा हूं।
शिंदे गुट की तरफ से भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया आई। देशबन्धु में प्रकाशित आईएएनएस रिपोर्ट के अनुसार, शिवसेना प्रवक्ता राजू वाघमारे ने कहा कि एकनाथ शिंदे पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ जैसी किसी प्रक्रिया की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार के पास बहुमत है और कोई चुनाव भी नहीं है।
जमीन पर असर
महाराष्ट्र की यह राजनीतिक हलचल दिल्ली और मुंबई के सत्ता गलियारों से आगे भी असर डालती है। अगर सांसदों का पाला बदलता है या वे मुद्दों पर एनडीए के साथ मतदान करते हैं, तो केंद्र में कानूनों और संवैधानिक प्रस्तावों पर संख्याबल बदल सकता है। इसका असर पूरे भारत के नागरिकों पर पड़ सकता है, क्योंकि संसद में पास होने वाले फैसले राष्ट्रीय स्तर पर लागू होते हैं।
महाराष्ट्र के मतदाताओं के लिए सवाल अलग है। जिन सीटों पर लोगों ने शिवसेना यूबीटी उम्मीदवारों को चुना, वहां पाला बदलने की स्थिति में प्रतिनिधित्व की राजनीतिक पहचान बदल सकती है। यही कारण है कि दलबदल विरोधी कानून की गणना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मतदाता भरोसे का मुद्दा भी बन जाती है।

यह घटना महाराष्ट्र की हालिया राजनीति की निरंतरता भी है। पहले शिवसेना और फिर एनसीपी में टूट ने राज्य की सत्ता संरचना बदल दी थी। अब सांसदों को लेकर उठे दावों ने वही सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्षेत्रीय दलों की एकजुटता संसद के समीकरणों के सामने कितनी टिकाऊ रह पाएगी।
आगे क्या होगा
अभी सबसे बड़ा तय कार्यक्रम 14 जून की बैठक है, जिसे उद्धव ठाकरे ने मातोश्री में बुलाया है। इस बैठक में कितने सांसद आते हैं और क्या कोई सार्वजनिक बयान जारी होता है, इससे आगे की दिशा साफ होगी।
रिपोर्टों में मानसून सत्र से पहले किसी बड़े राजनीतिक कदम की संभावना भी जताई गई है, लेकिन किसी औपचारिक घोषणा की पुष्टि नहीं हुई है। टीएमसी के कथित बागी सांसदों के दावों का आगे क्या होता है, यह भी एनडीए की लोकसभा रणनीति और शिवसेना यूबीटी पर दबाव को प्रभावित कर सकता है।
एक नजर में
- शिवसेना यूबीटी के लोकसभा में 9 सांसद हैं।
- दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए कम से कम 6 सांसदों का साथ जाना अहम माना जा रहा है।
- उद्धव ठाकरे ने 14 जून को मातोश्री में सांसदों की बैठक बुलाई है।
- रिपोर्टों में दावा है कि कुछ सांसद एकनाथ शिंदे के संपर्क में हैं; कई नेताओं ने इन दावों को खारिज किया है।
- एनडीए लोकसभा में 360 के दो-तिहाई आंकड़े के करीब पहुंचने की कोशिश में बताया जा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शिवसेना यूबीटी के कितने सांसद हैं?
रिपोर्टों के अनुसार, उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी के लोकसभा में 9 सांसद हैं।
14 जून की बैठक क्यों अहम है?
उद्धव ठाकरे ने अपने सभी सांसदों को मातोश्री बुलाया है। यह बैठक उन दावों की पृष्ठभूमि में हो रही है कि कुछ सांसद एकनाथ शिंदे के संपर्क में हैं।
दलबदल विरोधी कानून में 6 सांसदों की चर्चा क्यों है?
क्योंकि शिवसेना यूबीटी के 9 सांसदों में से कम से कम 6 का साथ जाना दो-तिहाई संख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एनडीए के लिए 360 का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण है?
रिपोर्टों में बताया गया है कि 540 सदस्यीय लोकसभा में दो-तिहाई समर्थन के लिए 360 सांसदों का आंकड़ा अहम है, खासकर संविधान संशोधन जैसे मामलों में।
क्या शिवसेना यूबीटी में टूट की पुष्टि हो गई है?
नहीं। कई रिपोर्टों में अटकलें और सूत्रों के दावे हैं, लेकिन किसी औपचारिक टूट या विलय की पुष्टि नहीं हुई है।
संसाधन
इस लेख में उद्धृत स्रोत और संदर्भ।
