प्राइवेट कंपनियों के आकर्षक पैकेज का असर: इसरो में वैज्ञानिकों के इस्तीफों की झड़ी, सरकार ने कड़े किए नियम
बेंगलुरु के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के गलियारों में पिछले कुछ महीनों से हलचल तेज थी, लेकिन यह हलचल किसी नए रॉकेट लॉन्च की नहीं बल्कि अधिकारियों के विदाई समारोहों की थी। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के कई आला और अनुभवी वैज्ञानिक एक-एक कर अपनी सरकारी डेस्क छोड़ रहे हैं। इस पलायन की गंभीरता को भांपते हुए भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (DoS) ने अब एक बेहद कड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है, जिसने वैज्ञानिकों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) की सामान्य प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
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ऐसे बदला नियमों का ढांचा
अंतरिक्ष विभाग ने 14 जुलाई 2026 को एक नया आंतरिक मेमोरेंडम जारी किया है। इस नए फरमान के तहत गगनयान जैसे देश के अति-महत्वपूर्ण और राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट्स से जुड़े Group 'A' के वैज्ञानिक और टेक्निकल स्टाफ अब आसानी से नौकरी नहीं छोड़ पाएंगे। सरकार ने साफ किया है कि देश के बड़े मिशनों को बीच में छोड़कर जाने वाले अधिकारियों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के आवेदनों को अब रूटीन के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इस नए आदेश ने साल 2020 में लागू किए गए उस प्रशासनिक नियम को पूरी तरह पलट दिया है, जिसमें इसरो के विभिन्न केंद्रों के डायरेक्टर्स और यूनिट प्रमुखों को Group-A स्तर तक के कर्मचारियों के इस्तीफे स्वीकार करने का अधिकार दिया गया था। अब किसी भी केंद्र के डायरेक्टर सीधे तौर पर इस्तीफा मंजूर नहीं कर सकेंगे। उन्हें हर ऐसे आवेदन को अपनी उचित सिफारिशों के साथ सीधे दिल्ली स्थित अंतरिक्ष विभाग के मुख्यालय को फॉरवर्ड करना होगा, जहां अंतिम फैसला लिया जाएगा। इसके अलावा, नियमों के अनुसार संस्थान छोड़ने की इच्छा रखने वाले हर वैज्ञानिक को कम से कम तीन महीने पहले लिखित नोटिस पीरियड सर्व करना अनिवार्य होता है।
प्राइवेट सेक्टर की तरफ बढ़ा वैज्ञानिकों का रुझान
आखिर देश की सबसे प्रतिष्ठित स्पेस एजेंसी के होनहार वैज्ञानिक अचानक सरकारी नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह भारत के घरेलू प्राइवेट स्पेस सेक्टर में आया जबरदस्त उछाल है। सरकार ने हाल के वर्षों में निजी कंपनियों को बड़े सैटेलाइट प्रोजेक्ट्स सौंपने और लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के दरवाजे खोले हैं। इस नई नीति के कारण बाजार में अनुभवी स्पेस प्रोफेशनल्स और रिसर्चर्स की मांग अचानक आसमान छूने लगी है।

निजी कंपनियां सरकारी वेतनमान के मुकाबले इन वैज्ञानिकों को भारी-भरकम पैकेज, तेज पदोन्नति और दफ्तरशाही से मुक्त कार्यक्षेत्र का ऑफर दे रही हैं। इसरो से नौकरी छोड़ने के बाद ये वैज्ञानिक कॉर्पोरेट स्पेस इंडस्ट्री का रुख कर रहे हैं, जिससे इसरो के भीतर वरिष्ठ स्तर पर मैनपावर का भारी संकट खड़ा हो गया है।
राष्ट्रीय मिशनों पर मंडराया संकट
हालांकि, इसरो के कुल 14,600 से अधिक कर्मचारियों की संख्या के सामने हाल ही में इस्तीफा देने वाले करीब 100 से 120 वैज्ञानिकों का आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं दिखता, लेकिन असली चिंता उन विभागों और पदों की है जहां से इस्तीफे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, करीब 1,339 कर्मचारियों वाले यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) से अकेले लगभग 80 वैज्ञानिक नौकरी छोड़ चुके हैं। इसी तरह, रॉकेट टेक्नोलॉजी के प्रमुख केंद्र विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) से कम से कम 20 वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने विदा ले ली है।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब देश के बेहद संवेदनशील मिशनों के मुख्य संचालक इस फेहरिस्त में शामिल हो गए। इनमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैं:
- विक्टर जोसेफ: विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) के अंतर्गत LVM-3 परियोजना के प्रोजेक्ट डायरेक्टर।
- आदित्य रल्लापल्ली: चंद्रयान-3 मिशन के सिमुलेशन प्रोजेक्ट मैनेजर। इन्होंने मून लैंडिंग को वैलिडेट करने के लिए 1 लाख से अधिक परीक्षणों से करीब 25 टेराबाइट डेटा तैयार करने वाली टीम का सफल नेतृत्व किया था।
- SpaDeX प्रोजेक्ट डायरेक्टर: यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) के अंतर्गत इस महत्वपूर्ण मिशन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने भी संगठन का साथ छोड़ दिया है।
इन अनुभवी दिग्गजों के अचानक जाने से गगनयान जैसे महत्वाकांक्षी और संवेदनशील मिशन की समय सीमा और क्रियान्वयन की रफ्तार प्रभावित होने की गंभीर आशंका पैदा हो गई है।
आंकड़े और पूर्व अधिकारियों की चिंता
इसरो में वैज्ञानिकों का पलायन नया नहीं है। आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो 2012 से 2024 के बीच करीब 700 कर्मचारियों ने इस्तीफा दिया था। इससे पहले 2004 से 2007 के बीच भर्ती हुए लगभग आधे नए कर्मचारियों ने भी बाद में संगठन छोड़ दिया था। हालांकि इसरो की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 1,050 वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक पदों पर भर्ती की प्रक्रिया फिलहाल अंतिम चरण में है, लेकिन अनुभवी वैज्ञानिकों की खाली जगह को नए रंगरूटों से तुरंत भरना आसान नहीं है।
सरकार के इस नए प्रतिबंधात्मक आदेश पर इसरो के कुछ पूर्व अधिकारियों ने गहरी चिंता जताई है। एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का मानना है कि केवल प्रशासनिक पाबंदियां लगाने से वैज्ञानिकों का टैलेंट ड्रेन नहीं रोका जा सकता। ऐसी पाबंदियां कर्मचारियों को डिमोटिवेट कर सकती हैं। संगठन को यह समझना होगा कि युवा वैज्ञानिकों को रोकने के लिए सिर्फ सख्त नियम काफी नहीं हैं, बल्कि बेहतर कार्य संस्कृति, प्रतिस्पर्धी सैलरी पैकेज और अनुसंधान के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा।
नेतृत्व का आश्वासन
इस पूरे मामले पर इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्वीकार किया कि वैज्ञानिक संगठन छोड़ रहे हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने देश को आश्वस्त किया कि एजेंसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों का आना-जाना हर बड़े संगठन का हिस्सा है। इस नए मेमोरेंडम का उद्देश्य किसी को जबरन रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रीय महत्व के मिशनों की प्रगति पर अचानक कोई बुरा प्रभाव न पड़े। यदि कोई अधिकारी जाता भी है, तो उसकी जिम्मेदारी तुरंत दूसरा व्यक्ति संभाल लेगा और काम नहीं रुकेगा।
संसाधन
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